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आज़ाद--दीवाना कहो, चाहे पांगल बनाओ, दम तो मर मिटे ।
सख्तियाँ ऐसी 'उठाईं इन थुतों के द्विज़ में :
रंज सहते-सद्दते पत्थर का कलेजा दो गया ।
आज़ादु-कथा ६०३
उनहत्तरवाँ परिच्छेद..-
शाम के वक्त हलकी-फुडकी भर साफ-सुथरी छोलदारी में मिस
कलारिसा बनाव-चुनाव करके एक नाजुक धाराम-कुछ्तीं पर बैठी थी ।
चाँदनी निखरी हुई थी, पेढ भौर पत्ते दूध में नद्वाए हुए और हवा
भाहिस्ता-झाहिस्ता चछ रहो थी । उधर मिर्वाँ धाज़ाद केंद में पड़े हुए
हुस्नभारा को याद करऊे घिर घुनते थे कि एक श्रादसी ने श्राकर कहा--
चलिए, धापको मिस्त साइब बुलाती हैं। आज़ाद छोलदारी ऊफे करीब
पहुँचे तो सोचने लगे, देखे, यह कि तरह पेश झाती है। अगर कहीं
साइबेरिया सेज दिया तो वेमोत ही सर जायेगे। अन्द्र,जाकर सलाम
किया और हाथ बाँघकर खड़े हो यय्रे । क्लारिसा ने तीखी चित्तवन ऋर
कहा--कहिए, सिज़ाज़ 5ण्डा हुआ या नहीं ?
आजाद -इस वक्त तो हुजूर के पंजे में हूँ, चाहे कत्छ कीजिए,
चाहे स॒लो दीजिए ।
क्लारिसा--जी तो नहीं चाहता कि तुम्हें साइबेरिया भेज, मगर
बज़ीर के हुक्म से सनवूर हूँ! वज़ीर ने सुभे श्रख्तियार तो दे दिया है
कि चाहूँ तो तुम्हें छोड़ हूँ छेकिन बदनामी से डरती हूँ। जाश्रो,
रुखसत !
फोन के अफुन्तर ने हुक्म दिया कि सौं सवार आज़ाद को लेकर
सरहद पर पहुँचा आावें। उनके साथ कुछ दूर चलने के धाद श्राज़ाद ने
पृछा--क्यों यारो, अब ज्ञान बचने की भी कोई सूरत है या नहीं ? .
एक सिपाही -बस्, पक सूरत है कि जो सवार तुम्हारे साथ जायें
वह तुम्हें छोड दें । हि ९
शप्राजाद--भला, वे लोग क्यों छोडने लगे ? हि मन
६०४ आज़ाद कंथा
प्रिपाही--तुम्हारी जवानी परः तरस श्राता है। अगर हम साथ
चले तो ज़रूर छोड़ देंगे । ह
: सीक्षरे दिव भाज़ाद पाशा साइंवेरिया जाने को तैत्रार हुए । सो
सिपाही परे जसाए हुए हथियारों से लैस, उनके साथ चलने वो तैयार
थे। जब श्राजाद घोडे पर सवार हुए तो हजारदा आदुमी उनकी हालत
पर शअ्फ़प्नोत्त कर रहे थे। क्लितनी ही भोरतों रूसाल से आँसू ऐोछ रही
थीं । एक शोरत इतदनो वेकरोंर हुई छि जाकर श्रंफ़ुसर से बोली--हज़र,
यह आप बड़ा ग़ज़ब करते हैं। ऐसे बहादुर आदमी को आप साइदेरिया
भेज रहे हैं ! ।
अफसर--मैं मजदूर हूँ। सरकारी हुक्म की ' नामोल करता मे।
फर्ज है । 9
दूसरी खी--इस बेचारे की जान का झुदां हाफ़िज़ है। बेकुज्ूर जाने

जाती है। व
तीसरी खी-..श्राशो, सब-की-लय मिऊछकर चल श्र मिस्र लाइन से
सिफारिश करें । शायद्‌ दि प्तीज जाय ।
/ येवादें करके वह कई झोरतों के लाध मिल क्लारिसा के पास
जाकर बोली--हुज़ूर, यह क्या गजब करती हैं । अगर श्राजाद सर गए
तो आपकी कितनी बढ़ी बद॒नामी होगी ९
- कक्‍्लारिसा-उनको छोड़ना मेरे इमकान से बाहर है ।
चह खी--कितनी जालिम ! कितनी बेरहम हो ! जरा आताद को
हर
रत तो चलकर देख लो ।
क्लारिखान-दम कुछ नहीं जानते !. ते
शत्र तक तो धाजाद को व्स्सेद थी कि शायद मिस वलारिया झुक
पर रहम करें, लेकिन जब इधर से होई उम्मेद न रही शरीर 'साक्ूम हो
शआाज़ाद कथा ६०७५
7४ गया कि बिना साइवेरिया गए जान न बचेगी तो रोने छगे । इतने
ज़ोर से चीते क्कि मिस क्छारिसा के बदन के रोदूँ खड़े दो गए और थोडी
: डी दर चले थे कि घोड़े से गिर पडे ।
[गे / एक सिपाही-परे चारो, शब यह मर जायगा ।
(दूसरा पघ्िपााही-मरे या जिए, साइयेरिया तक पहुँचाना ज़रूरी हे ।
५! तीधरा तिपाही-मभाई, छोड़ दो । कह देना, राध्ष्ते में मर गया।
6... चौथा सिपाही-हमारी फौज में ऐसा सुश्प्रव घौर कड़ियल जवान
मै) दूसरा नहीं है। हमारी सरकार को ऐसे वहादुर झफसर की कदर करनी
चाहिए थी ।
॥. पाँचवाँ प्षिपाही-शअ्रगर झ्राप सच छोग एक-राय हों तो इम इसकी
जान बचाने के लिए अपनी ज्ञान खतरे से ढाल । मगर तुप्त छोग लाथ
॥# "न दीगे। . पी
छठा सिपाही-पहले इसे होश में छाने की फिक्त तो करो ।
/ जब पानी के पत्र छींटे दिए गए सो ,श्ाज़ाद ने करदट बदली।
सवारों को ज्ञान से जान आई। सब उनको लेकर श्रागे बढ़े ।
: सत्तरवाँ एरिच्छेंद
आज़ाद तो साइवेरिया की तरफ़ रवाना हुए, इधर खोजी ने द्रख्त
है पर बैठे-वैठे अफीम की डिविया निकाली] वहाँ पानी कहाँ ! एक आादसी
दरख्त के नीचे बैठा था। आपने उससे कद्टा--भाईजान, जरा पानी तो
पिछा दो । डखने ऊपर देखा, तो एक बौना चैठा हुआ है। बोला--तुम
8 ऊन ही ! दिल्‍्छगी यह हुईं कि वह ऋषीसी था। खोजी उर्दू में बात
है ऊरते थे, वह फ्रांध्ीसी में जवाब देता था । ५
रू
के
द्ण्द आज़ाद-कथा
खोजी-अफीम घोलेगे मियाँ ! ज़रा-सा पानी दे डालो माई ”
फ्रॉल्तीती-वाह, क्या स्रत हे | पहाड़ पर न आकर बैठों ?
खोजी--भई वाह रे हिन्दोस्तान ! घल्छाह इस फसल में सबोट
पर पानी मिलता है, केंवड़े का वा हुआ । हिन्दू पौसरे' बैठाते हैं भो
तुम जरा पानी भी नहीं देते । ।
फ्रांसीसी--कहीं ऊपर से गिर न पड़ना।
खोजी-- (इशारे से) अरे मियाँ पानी-पानी !
फ्रांधीसी - हम तुम्दारी बात नहीं समझते । ।
खोजी--उतरना पड़ा हमें । श्रवे, ओ गीदी, जरा-सा पानी क्‍यों नहं
दे जाता | कया पाँचों की सेंददी गिर जावयो धः
फ्रांसीधी ने जब श्रव भी पोनी न दिय्रा तो खोजी ऊपर से पं
तोड़-तोड़ फेंकने लगे | फ्रांसीध्ती कल्छाकर बोला--बचा,क्यों शामतें, भाई
हैं। ऊपर आऊर इतने घूं से छूगाऊँगा कि सारी शरारत निकछ जायगी।
खोजी ने ऊपर से एक शाख'सोदूफर फेंकी । फ्रांसीसी ने इतने ढेले मारे
कि खोजी की खोपड़ी जानती होगी । इतने में एक तु्क झा विक्रढा।
उसने समका-बचुझाकर खोजी को नीचे उतारा । खोजी ने श्रफ्रीम घोढी,
चुसद्नी लगाई भर फिर दरख्त पर जाकर पुक मोटी शाख से टिककर
पीनऊ लेने छगे । श्रत्र सुनिए कि सुकों ओर रूसियों में इस चक्त सूत्र
गोले चक् रहे थे तुकी ने जान तोड़कर मुकाबिछा किया मगर फ्रांसीसी
तोपखाने ने बनके छक्के छुट्टा दिए भौर उनका सरदार श्राप्तफ पाशां

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