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' दारोगा क्ा बस चदुता तो कड्ठार को, जीता “झुनवा - देते, मगर
बेवस थे। बेगम ने फहा--यस, जाओ । तुम किसी सप्तरफ़ के नहीं हो।
रात को अव्यासी वेगमपाइव से मीठी मीठी बाठें कर रही थीं हि
गाने की भावाज आई । बेगम ने पछा+-कौन गाता है १
« अव्यासी-हुज्वूर, सुफे साहूम, है। यह एक वीरू है।। सामने
मकान है। वक्कील क्वो तो नहीं जानतो, मगर उसके यहाँ एक आदमी
नौकर है, उस हो संत जानती हूँ । सलारबरर्आ नाम है। एक दिन वकील
साहब इवर से जाते थे। में दरवाजे पर खड़ी थी | कटने लगे--महरी
साहब, सलाम ! कहो, तुम्हारी बेगमधादव का नाम कया है ? मैंने कहा
झाप अपना मतलब कहिए, तो कहने लगे--कुछ नहीं, यों ही पूछता था।
बेगम--ऐसे झादुमियों को सु ६ न ऊूमाया करो ।
अ्रव्वासी-सुखतार है हुजूर, महताबी से मकान दिखाई
देता है। | ह॒ *
बेगम--चलो देखें तो, सगर वह तो न देख छेगे ! जाने भी दो।
“झअव्वासी--वहीं हुजूर, उनको क्या साछूम होगा। चुपके से चछकर
देख लीजिए । है
बेगभसाहब महताबी पर गई तो देखा कि वक्कीझुलाहब परुंग पर
फैले हुए हैं श्रोर सकारू हुक्‍्का भर रहा ऐ। नीचे श्राई तो श्रव्वासी'
ब्रोली->हुजूर, वह सकारवए्श कहता था कि किसी पर मरते हैं ।
बेग->सवह कोन थी ? ज़रा नास तो पूछना ।, ँ
श्रद्यापी-+माम तो वत्तावा था, मगर ह्ुके ' याद नहीं है। देखिए
शायद जेहन में आ जाय । आप दुस-पॉच नाम के । -
बेगम्+नज़ीरवेगस,, जाफरीबेगस, हुसेनीलानम, शिव्योखावम।
4
'आज़ाइ-कथधा ०६९
अं
अब्यासी--(उछलऊर) जी एॉ, यही प्रही, मगर मिव्योखानमः नहीं
शिब्पोजान बताया था। हे ै
.. सुरेयाबेगम ने सोचा,इस पणछे का पड़ोस प्रेच्छा नहीं, शुरू देके चला
आई हूँ, ऐसा त हो, ताइ-मॉाँक करे; दरवाजे तक था ही घुका, ंडशासी
गौर पघरारू में बातन्चीत भी हुईं, झग फकृत इतना माकुम द्ोना बाक़ी
है कि यही शिव्योतान हैं! कहीं एसारे आदेतियों पर यह भेद छुल भोय
: तो ग़ज़ब ही हो ज्यय । किसी तरद सझान बदरू दैना चाहिए। शोत को
तो इसी खयाल में सो रहीं। सुबह को फिर वही घुन समोई कि भाज़ांद
' आएँ और अपनी ' प्या री-प्यारी रत 'दिखाएँ। चह अपना हाल कहें,
टम ऋपनी बीती छुनाएँ । सगर धाज़ाद श्रव की समेत यह टठाट देखेंगे से
| म्या खयाल करंगे। कहीं यह ने समझे कि दीलत पाकर मुझे भूल यह ।
/ धब्बासी को घचुलाकर प्छा--तो श्रागण कब जाहश्ोगी १
शअव्यासौ--हुज़र, चाह फोई दो घढ़ी दिन रदे ज्ञाजगी और बाव की
/ दांत में साथ छेकर श्रा जाऊँगी।
उधर सिरता शझाज़ाद वन-ठनकर आने ही को थे कि एक शाहसाहटये
' खट-पढ करते हुए कोठे पर थआ पहुँचे । झ्राजाद ने कुकक्र सलाम किया
| और बोले -बआाप खुंच झराए। बतलाइए एम मिस्र काम को जामा चाहते हैं
वह पूरा होगा या नहीं ?
.. शाइ--कऊूगन घाहेंएं। घुन हो तो ऐसा कोई कास नहीं जो एरा व हो।
आज़ाद--बुस्ताखी माफ कीजिए तो एक पाते पछू, मगरें घेरा न
मानिएया! | ः *
शाह--पस्ताखी कैसी, जो कुछ कहना हो शोक से कहो।
श्राज़ाद--उस पयछी श्रीरत से आपको प्यों मुएब्गंत है ?
शाइ--5से पयेली न कही, मैं उसकी सूरत पर नहीं, उसकी सीरत
[6
जे
० आज़ाद-कथा
पर मरता हूँ। मैंने बहुतले भीौछिया देखे पर ऐसी भौरत मेरी नजः
भाज तक नहीं गुजरी | अलारम्खी सचमुच जन्नत की परी है। उछ
याद कभी न भूलेगी | उध्का एक आशिक शाप ही के नाम का था
इन्हीं बातों में शाम हो गई, आसमान पर काली घटाएँ छा:
और ज़ोर से सेंह बरपने ऊगा। श्राज़ाद ने जाना सुझतवी कर दिय
सुबह को भाष एक दोस्त की - मुछाकात को गये । वर्हां देखा कि :
आदमी मिलझर पुर श्रादमो को बना रहे हैं ओर तालियाँ बन्ना रहे
वह दुबला-पतला मरा-पिटा आदम्ती था। इनको करीने से माछूम
गया कि यह चण्द्बाज है। बोले -क््यों भई चण्ड्बाज, ऋमी नीः
भी की है!
चण्ड्बाज--अजी हमरत, उम्र भर डंड पेले, झोर सोड़ियाँ हिल्ा।
शाही में भव्याजान की बदौलत दाथोनशीन थे । श्रभी पारसाल तक-॑
भी घोड़े पर सवार होकर निकलते थे। मगर जुए की ऊत थी, टके दक्े
मुदृतान हो गए । आखिर, सराय में एक भठियारी- अछारक्खी के य
नीकरी कर ली ।
भाज़ादु-किप्तके यहाँ ?
चण्ड्वाल-भक्तारक्खी , नाम था। ऐसी खुबप्रत कि में व
अज़े करूँ । 7 उप 7 लह
« आजाद*-हाँ, रात को-भी एक झ्ादमी ने तारीफ़ की थी ।
. -चण्डबाज--तारीफ़ कैसी ! तप्वीर ही न दिखा हूँ ?
यह कहकर चण्डूबान ने अलारती की तलवीर निकाली |
आज़ाद--मो हो हो !
अजब है खींची मुसव्विर ने किस तरह तसवबीर;
कि शोखियों से वह एक रंग पर रहे -क्योकर !
अं ड्ा।5६ हा पा की ओ
चंदूयाज़--क्यों, है परी या नहीं ?
आज़ाद--परी, परी, प्रसतकू परी !
चह्ढज्राज़-उसी सराय में मिर्या भ्राज़ाद नाम के एक शरीफ दिखे
थे । बन पर आशिक हो गहे। बच, कुछ आप ही की-छी स़रत थी।
शझाज़ाद--अ्रव यह बताओ कि वह झाजफछ कहाँ है ?
चेंदुबाज--यह तो नहों आनते, मगर यहां कहीं हैं । सराय से तो
भाग गई थीं ।
श्राजाद ने तांद लिया कि अलारह्सी ओर सुरेयावेगम में कुछ
न कुछ भेद जरूर है [[चण्ड्वाज़ को अपने घर छाए भौर पथ चण्दू
पिछाया। जब दो-तीन छींटे पी छुके तो भाज़ाद ने का--भव चलारक्पी
का मुफ़स्सल हार बताओ । हि
चण्ड्याज़ -अलारज़्जी की स्रत्त तो श्राप देख ही चुके, अब धनकी
सीरत का हाल सुनिए । शोप, घुल्युली, चँचछ, धागभभूका, तीखी
चितबन, मगर हें छमुख | मिर्याँ ग्राज़ाद पर रीक गईं। अय आज़ाद ने
वादा किया कि तिकाहइ पद़्वाएँसे मगर क़ोछ हारकर निकझ गए।
इन्होंने नालिश कर दी, पकड़ आए मंगर फिर भाग गए। इसके बाद
एक बेगम हुस्तआरा थी, उस पर रीमे । उन्होंने कह्ा-रूम की रूड़ाई
में नाम पैदा करके झ्ाझो तो एम निकाह पर राजी हो | व्त, रूस की
राह छी | चलते वक्त उनकी अलारस्पी से मुछाकात हुईं तो उसने
कहा--हुस्मआरा तुम्हें मुवारक ही, मगर हमको व भूल जाना। भाजाद
ने कद, हरगिज्‌ नहीं ।
आज़ाद-हुस्नभारा कहाँ रहती है ?

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