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पघाह्य ने वह काम किया कि झपतम के दादा से भी न हो सफता।*
करोड़ रूपी पदरा ये रहे ये भौर में पैंतरे बहता हुआ देन से गाया,
छड्कटी टेझी और उढा। दो फरोए़ रूसी दीड़े, मर झुझभे पकद पा
दिह्छगी नहीं। कष्ट दिया, छो दस रूर्प होते हैं, चोरी से नहीं छर्ले, है
की चोट कटकर चले । ;
श्राज़ाद-कथा ६२३
श्रभी वह यह हाँक लगा ही रहे थे कि पीछे से किसी ने दोने| हाथ
पक्रड लिए और घोड़े से उत्तार लिया ।
- खोजी--ए कौन है भई १ से समझ गया, मिर्याँ आज़ाद हैं
मगर आजाद वहाँ कट्दों, यह रूसियों की फ़ौज़ थी । उसे देसते ही
खोजी का नशा हिरन हो गया। रूसियों ने उन्हें देख४र ख़ब तालियां
बजाई | खोनी दिरू ही दिल में कटे जाते थे सगर बचने की थोई तद॒बीर
न सकती थी। सिपाहियों ने खोजी को चपतें जमानी शुरू वीं। उघर
देखा इधर पढ़ी । खोजी बिगड़रूर बोले--अच्छा गीदी, इस वक्त तो
बेवस हूँ श्रव की फँसापो तो कहूँ । कसम है अपने कदमों की भाज तक
कभी किधी को नहीं सताथा | और सब कुछ किया, पत्तंग जड़ाए, बटेर
लड़ाए, चण्डू पिया, अफ्रीम खाई, चरस के दम लगाए, सदक फे छोटे
डडाए मगर किस सरदूद ने किसी ग़रीब को सताया हो ।
यह सोचकर सोनी की आँखों से आँसू निकछ आये। '
एक मघिपाही ने कहाल्‍्॑वध अत्र उसको दिक न करो | पहले पएछ लो
कि यह है कौन भादमी | एक बोला--यद तुकीं है कपड़े कुछ बदल डाले
हैं। दूसरे ने कहा--यह गोइन्दा है, हमारी टोह में श्राया है ।
ओरों को भी यही शुबद्ा हुआ। कई श्रादम्रियों ने खोजी को तलाशी
छी । श्रव ख़ोजी श्रौर सब अ्रसयाव तो दिखाते हैं मगर श्रफीम की
डिब्रिया नहीं खोलते | *
एक रूसी--इससमें कौन चीज है १ क्यों तुम इसको खोलने नहीं
देते ? हम जरूर देखेंगे ।
जोनी-ओ गीदी, सार्ूँगा बन्दूक, घुआँ उस पार हो जायगा।
जमरदार जो डिबिय्रा हाथ से छुई ! भगर तुम्हारा दुशमन हूँ तो मे हूँ ।
सुरे चाहे मारो चाहे केद करो, पर मेरी डिबिया में हाथ न रूगाना ।
ञ्त
रे आज़ाद-कथा
झतियों को यकीन हो गया कि डियिया में जरूर कोई कोमती चीः
है। जोजी से डिविया छीन ली । सगर हाय उनमें भापस में एड़ाईडों'
लगी। एक कह्ठता था डिविया एमारी ऐ, दूसरा कहता था एमारी है
आखिर यद सलाद हुई कि डिविया में प्रो कुछ निकले यह सब झा
मियों से वरादर-परावर धाँद दी जाया गरण टठिग्रिप्रा खोलो गई ह॑
भ्फ़ीस निकली । सब-फे सब शर्मिन्दा हुए । एक सिपाही ने फष्टा--एहु
दिचिया को दरिया में फक दो। इसी के लिए इस में तलवार शलते
शलते यची ।
इसरा बोका-हसे श्राय में जछा हो ।
खोनी--हम कहे देते है ठिथिया हमें वापस कर दो, सहीं हस बियद
शायगे तो फ़पामत शा जायगी । चरमी तुम हमें नहीं ज्ञानते !
सिपाहियों ने समझ लिया कि यह कोई दीवाना ऐ, परागल्ीखाने
से भाग शाया है। उन्होंने सोजी फो एक घड्टे पिंशरे में थंद्ध फर टिपा।
झबद भमिर्या सोमी की मिद्दी-पिद्ठी भूल गई। घिल्लाकर बीले-हाप
क्षाज्नाद ! अग्र तुस्हारी प्तर्म न देखेंगे ! सैर, जोगी ने नमक करार
अदा फर दिया। भय घह भी फैद की मुसीयतें केछ रद्ा ऐ शोर सिफ
तुम्दारे लिए। पक सार पज़ाछिमों के पंजे से किसी परह सारनूटकर
निव छ भागे थे, मगर तकदीर ने फिर इसी कैद में छा फँसाया | हां
मरत्रों पर इसेशा मुसीबत शाती ?, इसका तो गम नहीं, ग़म हंसी का
है कि शायद अब सुमसे सुलाकात मे शोगी । खुश हएुर्सें खुश ररगे,
मेरी बाद बरते रहमान «
शायद बह आएं मेरे जनाजे प॑ बोत्तो,
आँखे खुली रहे मेरी दीदार के लिए ।
उस 2क>रममीकन-कसन २८ >कक++> कर,
आज़ाद-कथा ६२५
॥०“4 2 <«_ ७
न चोहत्तरवाँ परिच्छेद
मियाँ भाज़ाद काप्तकों के साथ साइवेरिया चले जा रहे थे । कई
दिन के बाद वह डेन्यूब नदी के किनारे जा पहुँचे, | चहाँ उनकी तबीयत
इतनी चुश हुईं कि हरी-हरी टूब पर लेट गएु और बड़ी हप्तरत से यह
गजल पढ़ने लगे--.
रख दिया सिर को तेग्रे-कातिल :पर,
हम गिरे। भी तो जाके मंजिल पर ।
आंख जब विसमिलो में ऊँची हो,
सिर गिरे कंटके पाय काठिल पर।
एक दमप्त भी तड़प से चेन नही,
देख लो द्ाथ रखके तुम दिल पर।
यह ग़जर पह़ते-पढ़ते उन्हे हुस्वशआरा की याद आ गईं और श्रॉखों
स आंध्र गिरने छगे । कासक छोगों ने समझाया कि सई ,अ्रव वे बातें
भूल ज़ाश्ो, अब यह समझो छि तुम वह शाज़ाद ही नहीं हो । श्राजाद
खिलखिलाकर हसे और ऐसा साकूम हुआ कि वह आपे में नहों हैं,
कासकें ने घवराकर उनको सेभाऊा शोर समकाने रूगे कि यह वक्त सत्र से
काम लेने का है। अबर होंश-हवास ठीक रहे तो शायद ऊिप्ती संदबीर से
वापस जा सके घरना खुदा ही द्वाफ़िज्ञ है। साइबेरिया से कितने ही कैदी
भाग बाते हैं मगर तुस वो अभी से हिम्मत हारे देते हो ।
इतने में वह जद्दाज़ जिस पर सवार द्वोकर आज़ाद को डेन्यूब के पार
जाता था तैयार हो यया। तब तो आज़ाद की श्राखों से आँसुथों का ऐसा
तार बँधा कि कासकों के सी रूमाल तर हो गए । जिस वक्त्‌ जहाज पर
सवार हुए दिल काछ्ल सें न रहा। रो-रोकर कहने छगे--हुस्तआरा, अब
६२६ आज़ाद कथा
आज़ाद का पता न मिलेगा। आज़ाद अब दूसरी दुनिया में हैं, भव
ख्वाब में सी इस आजाद की ज्त्त न देखोगी जिसे तुमने रूप भेजा )
यह कहते-ऋहते आज़ाद बेहोश हो गये। का पर्के ने उनको इन्न सुघाया
और खूब पानी के छींटे दिए तब जाकर कहीं उनकी श्राँखें खुलीं । इतने
में जदाज़ उस पार पहुँच गया तो आज़ाद ने रूम की तरफ़ सह कर के
कहा--झ्ाज सब्च कगडा खत्म हो गया। अब शऋाजाद की कमर साइयबेरिया
में बनेगी और कोई उस पर रोनैवाला व होगा ।
काप्के ने शाम को एक बाग़ सें पड़ाव ड छा और रात-भर वहीं
श्राराम किया । लेकिन जब सुयह को कूच की तैव्ारियाँ होने छर्मीं तो
आज़ाद का पता न था। चारों तरफ हुल्लड सच गया, इधर-उधर खबार
छूटे पर झाजाद का पत्ता ने पाया । वह बेचारे एक नई सुसीक्षत में
फँस गए थे ।
सबेरे मियाँ आजाठ की आंख जो खुजी तो ,अगने को !भजब हालत
में पाया। जोर की प्यास लगी हुईं थी, ताछू सूखा जाता था, भाँखे
भारी, तबीयत सुष्त, जिस चीज़ पर चज़र डालट्े परे छुँघली दिखाई द्वेती
थी। हाँ, इतना झलग्रत्ता साकूपत हो रहा था नके उनका पिर किप्ती के
जात पर है। मारे प्याज के ओउ लूख गए थे, यो, आँखें खोलते थे मगर
बात करने की चाहृत न थी | इशारे ले पानी माँगा और जब पेट-भर

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